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नौकरी के सफल सूत्र !
कवि निराश जी कविता के साथ-साथ सरकारी नौकरी भी सफलतापूर्वक करते रहे। न कविता पर नौकरी का कोई रंग चढ़ सका और न ही कविताई नौकरी के कारण घाटे में रही। सरकारी नौकरी से उनके साहित्य को बल मिला। नेताओं से सीधा संपर्क रहता था उनका।  नेताओं के प्रेस नोट लिखते, हर पांच साल में सरकारें बदल जाती मगर निराश जी के कंप्यूटर में पड़े जन-संदेश, भाषण और पर्चे नए दल के लिए भी काम में आ जाते, मानो अभी-अभी लिखे हों। नेताओं की सेवा करते रहने से उन्हें चोखा मेवा मिलता रहा। किसी भी प्रकाशक से अपनी कच्ची-पक्की कविताओं की पुस्तक छपवाकर निराश जी उसे सरकारी खरीद में उठवाकर हर साल लाख रुपये कमा ही लेते। अन्य समर्थ कवि मौजूद होते हुए भी सरकारी पुरस्कार कवि निराश जी को ही बार-बार दिए गए।
सक्रिय सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद एक नया जीवन आरंभ होता है। सरकारी नौकरी वैसे तो पेंशन समान ही होती है क्योंकि दफ्तर पहुंचना ही सबसे बड़ा काम होता है, उसके बाद बाबू से काम लेने की सारी जिम्मेवारी उसके सुपरवाइजर या बड़े अफसर पर है। सरकारी नौकरी में लगे बाबुओं की कार्यशैली को देखकर ही किसी कवि ने कहा होगा, ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम।’ बाबू तो कुर्सी पर पसरकर काम को टरकाने के सौ-सौ बहाने बनाता है। उसका तो उसूल है कि ‘आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों, ऐसी भी क्या जल्दी है जब जीना है बरसों।’
नौकरी में जाकर आदमी सौ पचड़ों से बचा रहता है। बीवी की चिख-चिख से निजात मिलती है और भरपूर आराम करने का अवसर मिलता है। तभी तो मशहूर है कि वर्कर बुरे नहीं होते, मैनेजर बुरे या अक्षम होते हैं जो लोगों से काम नहीं ले पाते। सरकारी दफ्तरों पर मैनेजमेंट के कोई भी नियम लागू नहीं होते क्योंकि दफ्तर किसी के बाप का तो होता नहीं जो उसकी चिंता की जाए। एक कहावत है कि जिंदा बाबू कख धेली का और मरा हुआ बाबू लाख का। बाबू की असली कद्र तो उसकी मौत या रिटायर होने के बाद ही होती है। सारी उम्र बाबू दफ्तर की सीढिय़ां फलांगता हुआ जूते घिसता है। महंगाई की तेज रफ्तार के साथ दौड़ते-दौड़ते उसके बालों में समय से पहले ही सफेदी उतर आती है।
एक बात की खुशी उसे जरूर होती है कि रिटायर होने पर उसे लाखों रुपये मिलेंगे और वह एक खुशहाल जीवन जिएगा। इस आयु में न तो उसके मुंह में दांत होते हैं और न ही पेट की कोई आंत सही-सलामत होती है। ऐसे में रिटायरमेंट पर मिले ढेरों पैसे उसके लिए ऐसे ही होते हैं जैसे गंजे के लिए हाथी-दांत की कंघी। उसके बाल-बच्चे ही सब कुछ किसी न किसी बहाने से झटक लेते हैं उसकी सारी माया। सारी उम्र तो तंगियों में कटी, अब लखपति बने तो क्या किया जाए।
सबको पता है कि सरकारी दफ्तर का बाबू अपनी पूरी नौकरी में दफ्तर में आराम करने की गरज से जाता है। हां, जो बाबू ईश्वर की कृपा से कमाई वाली सीटों पर तैनात होते रहते हैं, उन्हें काफी काम करना पड़ता है क्योंकि उसमें उनका अपना स्वार्थ भी छुपा होता है। बाकी लोग हाजिरी लगाकर प्राइवेट काम करने निकल पड़ते हैं। अफसर लोग तो नेताओं की खातिर दर-दर भटकते रहते हैं। नेता लोग सरकारी दफ्तरों को व्यक्तिगत जागीर समझते हैं और चुनावों के दौरान जमकर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करते हैं।
इधर किसी अन्य क्षेत्र में उन्नति हुई हो न हो, सरकारी कर्मचारियों की रिटायरमेंट पार्टियों में काफी ग्लैमर आता जा रहा है। लाखों रुपये खर्च करके बाबू के लिए चकाचक पार्टी का आयोजन किया जाता है। इस मौके पर सहकर्मियों ने एक झक्कास विदाई समारोह का आयोजन किया। रंगारंग कार्यक्रम हुआ। शराब की नदियां बही। इसमें उन लोगों ने निराश जी की मुक्तकंठ से प्रशंसा की जिन्हें निराश जी ने ढेरों फायदे पहुंचाए थे।
अपने भाषण में उन्होंने कई विनोदपूर्ण बातें की। वह बोले, ‘अब निराश कोई नौकरी नहीं करेगा और न ही किसी की चाकरी करेगा। अब तो बस साहित्य और पत्नी की सेवा में ही अपना शेष जीवन लगाने का इरादा है। अब मुझे पता चला कि साठ के बाद आदमी जवान होने लगता है। पिछले सात दिनों में मेरी जी-भर कर सेवा की जा रही है। नए-नए कपड़े और उपहार दिये गये। भरपूर प्यार लुटाया जा रहा है मगर अपने प्राविडेंट फंड के चेक पर मेरी पकड़ बहुत मजबूत है। कवि निराश साहित्य में कच्चा हो सकता है मगर पैसे के मामले में पक्का बनिया है। किसी को हाथ लगाने नहीं देगा।’


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